Galwan Valley Conflict In Hindi

भारत और चीन के बीच हिमालय की चोटियों पर दशकों से जारी सीमा विवाद 15 जून, 2020 को एक अत्यंत दुखद और हिंसक मोड़ पर पहुंच गया। लद्दाख की गलवान घाटी में हुई इस झड़प ने न केवल दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों को हिला कर रख दिया, बल्कि पिछले 45 वर्षों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर हुई यह पहली सबसे बड़ी सैन्य क्षति थी।

संघर्ष की पृष्ठभूमि

गलवान घाटी का सामरिक महत्व बहुत अधिक है क्योंकि यह भारत के महत्वपूर्ण ‘दार्बुक-शोक-दौलत बेग ओल्डी’ (DSDBO) रोड के करीब स्थित है। विवाद तब शुरू हुआ जब चीनी सैनिकों ने एलएसी के पास भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण करने और यथास्थिति को बदलने की कोशिश की।

15 जून की रात: क्या हुआ था?

मई 2020 से ही तनाव बढ़ रहा था, लेकिन जून के मध्य में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। 15 जून की रात को दोनों सेनाओं के बीच कोई गोलीबारी नहीं हुई (क्योंकि समझौतों के तहत हथियारों का इस्तेमाल वर्जित था), लेकिन यह झड़प पत्थरों, कंटीले तारों वाले डंडों और लोहे की छड़ों से लड़ी गई।

  • भारतीय हताहत: इस संघर्ष में भारत के 20 वीर सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया, जिनमें 16 बिहार रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू भी शामिल थे।

  • चीनी हताहत: चीन ने शुरुआत में अपने नुकसान को स्वीकार नहीं किया, लेकिन महीनों बाद आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि उसके भी 4 सैनिक मारे गए थे (हालांकि अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह संख्या कहीं अधिक बताई गई)।

संघर्ष के परिणाम और प्रभाव

इस घटना के बाद भारत और चीन के संबंधों में एक गहरा ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ (विश्वास की कमी) पैदा हो गया:

  1. सैन्य जमावड़ा: दोनों देशों ने सीमा पर भारी संख्या में सैनिकों, टैंकों और मिसाइल प्रणालियों को तैनात कर दिया।

  2. आर्थिक कड़ा रुख: भारत ने चीन पर ‘डिजिटल स्ट्राइक’ करते हुए TikTok और WeChat जैसे सैकड़ों चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया और चीनी निवेश के नियमों को कड़ा कर दिया।

  3. बुनियादी ढांचे का विकास: भारत ने सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों और पुलों के निर्माण की गति को और तेज कर दिया ताकि भविष्य में किसी भी चुनौती का सामना किया जा सके।

वर्तमान स्थिति

गलवान संघर्ष के बाद से दोनों देशों के बीच कमांडर स्तर की कई दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं। कुछ बिंदुओं (जैसे पैंगोंग त्सो झील) से सैनिक पीछे हटे हैं, लेकिन पूरी तरह से सैन्य वापसी और शांति की बहाली अभी भी एक लंबी प्रक्रिया है।

निष्कर्ष: गलवान घाटी का संघर्ष भारत की क्षेत्रीय अखंडता और अपने स्वाभिमान की रक्षा के संकल्प का प्रतीक है। यह याद दिलाता है कि हिमालय की शांति जितनी सुंदर है, उतनी ही संवेदनशील भी।

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