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चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत

चार्ल्स डार्विन (1809–1882) एक ब्रिटिश प्रकृतिवादी थे, जिन्होंने जीवविज्ञान की दुनिया में वैसी ही क्रांति ला दी जैसी भौतिकी में आइजैक न्यूटन या अल्बर्ट आइंस्टीन ने की थी। उनकी 1859 में प्रकाशित पुस्तक ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज’ (On the Origin of Species) ने जीवन को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया।

डार्विनवाद के मुख्य स्तंभ

डार्विन का सिद्धांत मुख्य रूप से इस विचार पर आधारित है कि जीवन स्थिर नहीं है; प्रजातियाँ समय के साथ बदलती हैं। इसके प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

डार्विन ने यह निष्कर्ष कैसे निकाला?

डार्विन की सबसे महत्वपूर्ण यात्रा HMS Beagle जहाज पर थी। जब वे गैलापागोस द्वीप समूह पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि अलग-अलग द्वीपों पर फिंच (एक प्रकार की चिड़िया) की चोंच की बनावट अलग-अलग थी।

द्वीप का प्रकार चोंच की बनावट कारण
जहाँ बीज अधिक थे मजबूत और मोटी चोंच बीजों को तोड़ने के लिए
जहाँ कैक्टस अधिक थे लंबी और नुकीली चोंच फूलों तक पहुँचने के लिए
जहाँ कीट अधिक थे पतली और छोटी चोंच कीड़ों को पकड़ने के लिए

डार्विन के सिद्धांत का प्रभाव

डार्विन के विचारों ने उस समय के धार्मिक और सामाजिक विश्वासों को चुनौती दी, क्योंकि उन्होंने बताया कि मनुष्य का विकास भी अन्य जानवरों की तरह ही हुआ है, न कि उन्हें अचानक बनाया गया है। आज यह सिद्धांत आधुनिक जीवविज्ञान, आनुवंशिकी (Genetics) और चिकित्सा विज्ञान का आधार है।

“यह सबसे मजबूत प्रजाति नहीं है जो जीवित रहती है, और न ही सबसे बुद्धिमान; यह वह है जो परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक उत्तरदायी होती है।” — (डार्विन के विचारों का सारांश)

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